दूर मुँह से हुये निवाले हैं

दूर मुँह से हुये निवाले हैं पड़ गये ज़िन्दगी के लाले हैं।   हर तरफ़ काल का अँधेरा है, सहमे  सहमे हुए उज़ाले हैं।   ज़िंदगी दाव पर लगी सारी, पासे शकुनि ने जो उछाले हैं ।   लेके फरियाद…

ऐ दिलो जान मेरी जान बचाने आजा

ऐ दिलो जान मेरी जान बचाने आजा। आज झूँठा हि सही प्यार जताने आजा ।   ग़म ज़दा और परेशान हूँ जाने जाना। प्यार का गीत कोई मुझको सुनाने आजा ।   फासले क्यूँ  हुए ये राज बताने लिये। मेरे…

दर्द सीने में दबाकर मुस्कुराना ही पड़ा

दर्द  सीने  में  दबाकर  मुस्कुराना   ही पड़ा और रस्मन महफ़िलों में गुनगुनाना ही पड़ा।।   थी अना दस्तार की ऊँची बहुत उसके लिए बाप था बेटी का वो सज़दे में आना ही पड़ा।।   लाडली  वो थी चमन गुंजार  था…

क्या कहूँ इस दौर का इंसान कैसा हो गया है

क्या कहूँ  इस दौर  का  इंसान कैसा हो गया है। अब हवाओं का भी रुख तूफ़ान जैसा हो गया है।   बीस  दंगे  कत्ल बाइस  लूट की गिनती नही है, उसका भी सम्मान अब सम्मान जैसा हो गया है।  …

शौहर मेरे

इतने  ज्यादा हुस्न  से भरपूर  हैं शौहर मेरे। अपनी सुन्दरता में बिल्कुल चूर हैं शौहर मेरे।   कलमुँही जितनी हैं सबकी आँखों के तारे हैं वो, इस  लिए  मेरी  पकड़   से  दूर  हैं  शौहर  मेरे।   कोई कहता सेब हैं…

ख़यालों में मेरे उससे कोई बेहतर नहीं आता

न जाने क्या हुआ अब वो हमारे घर नही आता। ख़यालों में मेरे उससे कोई बेहतर नही आता।   बड़ी  ऊँची  हवेली  है, अमीरों  के  शहर  में है, कभी उसकी नज़र में अब मेरा छप्पर नही आता।   शिकारी हर…

कोरोना आ गया

उसकी हालत देख करके मुझको रोना आगया। यूँ  लगा  फिर  जैसे  कोई   जादू  टोना  आगया।   हमने पूछा नाक,मुँह दोनों ढके हो क्या हुआ, बोली  हमसे  भाग  बे   पीछे  कोरोना  आगया।   शँख,ताली,थाली,घण्टा खूब बजाया लोगों ने, हमने  भी  पीटा …

चोरों में चौकीदार की इज्जत नहीं रही

उस नेक से किरदार की इज्जत नही रही। चोरों में चौकीदार  की  इज्जत  नही रही।   कुछ माननीय बिकने लगे जबसे यहाँ पर, सच मानिए बाज़ार  की इज्जत  नही रही।   मज़लूम,बेगुनाहों  पर  उठने  लगी  जबसे, इस दौर  में तलवार…

ख़ामोशी की पुकार है  दुनिया

ख़ामोशी  की पुकार है  दुनिया। जीत होकर भी हार है दुनिया।   अपने मतलब से बात करती है किस कदर होशियार है दुनिया।   एक लमहे में डूब जाएगी पानियों पर सवार है दुनिया।   मेरी पगड़ी उछालने के लिए…

सदियों से दुख झेल रहा हूं मैं उस पल के बारे में

जो सुख का संदेस हो मेरे आज और कल के बारे में। सदियों से दुख झेल रहा हूं मैं उस पल के बारे में।   छोड़ गया वो मुझको अकेला इस दुनिया के मेले में ध्यान लगाए बैठा हूं मैं…

हमारे बारे में

हिंदी साहित्य की वाचक परंपरा कवि-सम्मलेन, जिसका उद्देश्य समाज का दर्पण होकर उसे उसके गुणों एवं अवगुणों से परिचित करवाते हुए एक उचित दिशा प्रदान करना है। कवि-सम्मलेन की ये परंपरा लम्बे समय से सामजिक चेतना का ये कार्य करती आ रही है। इसी परंपरा को सहेजने और संवारने का कार्य करने के उद्देश्य से हमने यह माध्यम तैयार किया है।

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