मैं उस पर कविता लिखता हूँ उसको पता नहीं

भोली सी नादान वो लड़कीं उसकी ख़ता नही मैं उस पर कविता लिखता हूँ उसको…

प्यासे प्यासे मेरे मछुआरे नयन

झुके कारे करारे शरारे नयन जैसे सागर में दो तैरती मछलियां प्यासे प्यासे मेरे मछुआरे…

जब तुम्हारी मांग में सिंदूर का टीका लगे

जब तुम्हारी मांग में सिंदूर का टीका लगे पांव में बिछिया ओ मेहंदी हाथ मे…

दो नयनों में काटी रात

चाँद उगा अम्बर आँचल में दो नयनों में काटी रात सर्द सुबह तक नर्म अंधेरा…

मुक्तक

1. लड़की दिल से तहस नहस निकली बात निकली तो फिर बहस निकली उसकी नफ़रत…

हमारे बारे में

हिंदी साहित्य की वाचक परंपरा कवि-सम्मलेन, जिसका उद्देश्य समाज का दर्पण होकर उसे उसके गुणों एवं अवगुणों से परिचित करवाते हुए एक उचित दिशा प्रदान करना है। कवि-सम्मलेन की ये परंपरा लम्बे समय से सामजिक चेतना का ये कार्य करती आ रही है। इसी परंपरा को सहेजने और संवारने का कार्य करने के उद्देश्य से हमने यह माध्यम तैयार किया है।

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