मैं तेरा देवदास हो गया

1. भटकती नदी को समन्दर मिला क्षितिज पर धरा से ये अम्बर मिला अपने दिल…

अरसे बाद हमने बेवफा में फिर वफ़ा देखी

मैं था जब बूंद तो नदिया सी तेरी हर अदा देखी नदी थी तुम चाह…

जो तीन लफ़्ज़ कहे तुझ से फ़ोन पर मैं ने

जो भेद तुझ में छुपे हैं वो खोल सकता हूँ । तेरे बदन को निगाहों…

वो सुर्ख़ फूल अभी तक मेरी किताब में है

कोई  सवाल  छुपा  तेरे   हर    जवाब में है । सदी का दर्द इसी दो मिनट…

अगर तुम सुनने आओगी, कई ग़ज़लें सुनाऊँगा

पुरानी  डायरी   से   कुछ   नई ग़ज़लें सुनाऊँगा । अगर तुम सुनने आओगी, कई ग़ज़लें सुनाऊँगा…

जो दर्द तुम्हे मीर की गज़लों में मिले हैं

जो दर्द तुम्हे मीर की गज़लों में मिले हैं। वो  सब   मेरी  तनहाई  के स्क्रीनप्ले…

अब ये अख़बार पुराना नहीं होने वाला

एक मौसम था   हरी घास पे सोने वाला । एक बादल था तेरा जिस्म भिगोने…

हमारे बारे में

हिंदी साहित्य की वाचक परंपरा कवि-सम्मलेन, जिसका उद्देश्य समाज का दर्पण होकर उसे उसके गुणों एवं अवगुणों से परिचित करवाते हुए एक उचित दिशा प्रदान करना है। कवि-सम्मलेन की ये परंपरा लम्बे समय से सामजिक चेतना का ये कार्य करती आ रही है। इसी परंपरा को सहेजने और संवारने का कार्य करने के उद्देश्य से हमने यह माध्यम तैयार किया है।

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