डॉ. विष्णु सक्सेना
डॉ. विष्णु सक्सेना
6 Articles0 Comments

पिता: श्री। (दिवंगत) एन.पी सक्सेना माता: श्रीमती (स्वर्गीय) सरला देवी पत्नी: श्रीमती वंदना सक्सेना पुत्र –सारांश, चित्रांश जन्म स्थान: गाँव -सहादत पुर, सिकंदरा राव, (अलीगढ़) यू.पी. शिक्षा: B.A.M.S. (राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर) सम्मान और पुरस्कार- यश भारती सम्मान, लखनऊ, मनहर पुरस्कार- मुंबई, देवीलाल समर अवार्ड-उदयपुर, सर्वश्रेष्ठ कवि पुरस्कार-उज्जैन, ओंकार तिवारी पुरस्कार-जबलपुर, जनहित सेवा पुरस्कार-चित्तौड़गढ़, सुनील बजाज पुरस्कार-कटनी, निर्झर अवार्ड-कासगंज, टूलिका अवार्ड-एटा, श्याम बाबा अवार्ड-हाथरस, हिंदी P.S. पुरस्कार- एस राव, महादेवी वर्मा पुरस्कार-फर्रुखाबाद, कीर्तिमान पुरस्कार-मैहर, गीत गौरव पुरस्कार-एटा, उर्मिलेश गीते श्री अवार्ड-बदायूं (मुलायम सिंह द्वारा), सविता भार्गव पुरस्कार- मथुरा, गोपाल सिंह नेपाली पुरस्कार-भागलपुर, मेघ श्याम पुरस्कार -वृंदावन, तुलसी माखन पुरस्कार-खंडवा, दीन दयाल उपाध्याय पुरस्कार- लखनऊ, हिंदी प्रचारिणी सभा पुरस्कार- कनाडा, हिंदी विक्स मंडल - रैले- यूएसए, IHA- क्लीवलैंड-यूएसए द्वारा पुरस्कार, IHA- सिनसिनाटी-यूएसए द्वारा पुरस्कार, हिंदी समिति द्वारा पुरस्कार- यू.के. उपलब्धियां लोकप्रिय पत्रिकाओं में प्रकाशित और चिकित्सा लेखों का प्रकाशन। आकाशवाणी पर राष्ट्रीय प्रसारण कैसेट- ‘शंख और दीप ',' प्रेम कविता ',' तुम्हारी ली '(सीडी)। पुस्तकें--मधुवन मिले ना मिले ’, ik आस्था का शिखर’ (स्क्रिप्ट), ‘खुशबू लुटाता हू मेन’, स्व अहसानों की ’ 'लोकप्रिया के शिखर गीत' विदेश- ओमान -1995; इसराइल-1997; थाईलैंड-2000,2006; अमेरिका-1997,2001,2003, 2011; नेपाल-2004; दुबई- 2004,2005,2007,2008,2009,2010,2011; हांगकांग-2007- 2009; टी और टी -2009; इंग्लैंड -2009

वासंती मौसम भी पतझड़ से हो गए

आँखों में पाले तो पलकें भिगो गए वासंती मौसम भी पतझड़ से हो गए   बीते क्षण बीते पल जीत और हार में बीत गयी उम्र सबझूठे सत्कार में भोर और संध्या सब करवट ले सो गए   जीवन की…

जब कभी भी हो तुम्हारा मन चले आना

जब कभी भी हो तुम्हारा मन चले आना द्वार के सतिये तुम्हारी हैं प्रतीक्षा में   हाथ से कांधों को हमने थाम कर साथ चलने के किये वादे कभी मन्दिरों दरगाह पीपल सब जगह जाके हमने बाँधे थे धागे कभी…

तुम मुझे खुल के गाना भजन की तरह

हो सके तो मुझे गीत दे दीजिए, मैं अधूरा पड़ा संकलन की तरह, मैं तुम्हें गुनगुना लूँ ग़ज़ल की तरह, तुम मुझे खुल के गाना भजन की तरह।   तुम बनो राधिका तो तुम्हारी कसम, कृष्ण-सा कोई वादा करूँगा नहीं,…

मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ

मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ। भँवरों का मदमाता गुंजन, तितली की बलखाती थिरकन, भीनी-भीनी गंध पुष्प की, कलियों का छलका-सा यौवन हरा-भरा ये उपवन तेरे नाम करूँ। मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।   शीतल मेघ छटा…

छोड़ चली क्यों साथ सखी री?

छोड़ चली क्यों साथ सखी री? इसीलिए हमसे रचवाए क्या मेंहदी से हाथ सखी री! गुमसुम होगी कल ये देहरी, सिसकेगा घर का अंगना। रोएँगी गुलशन की कलियाँ, हिलकी-भर रोयें कंगना। सूरज खाने को दौड़ेगा, डसे चंदनिया रात सखी री।…

मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ

भँवरों का मदमाता गुंजन, तितली की बलखाती थिरकन, भीनी-भीनी गंध पुष्प की, कलियों का छलका-सा यौवन हरा-भरा ये उपवन तेरे नाम करूँ। मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ। शीतल मेघ छटा केशों में, पलकों में दुनिया सपनों की, गालों…

हमारे बारे में

हिंदी साहित्य की वाचक परंपरा कवि-सम्मलेन, जिसका उद्देश्य समाज का दर्पण होकर उसे उसके गुणों एवं अवगुणों से परिचित करवाते हुए एक उचित दिशा प्रदान करना है। कवि-सम्मलेन की ये परंपरा लम्बे समय से सामजिक चेतना का ये कार्य करती आ रही है। इसी परंपरा को सहेजने और संवारने का कार्य करने के उद्देश्य से हमने यह माध्यम तैयार किया है।

संपर्क करें

पता: Plot no.828, Sector 2B, Vasundhara
Ghaziabad ,Uttar Pradesh,
India - 201012

फ़ोन: 7027510760

ई-मेल: [email protected]

Skip to toolbar