श्वेता सिंह
श्वेता सिंह
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निवास स्थान- वडोदरा (गुजरात) जन्म-17 जून शिक्षा-- पी. जी. दीनदयाल उपाध्याय (गोरखपुर यूनिवर्सिटी) लेखन-- सारी विधाएँ प्रकाशित रचनाएँ-- विभिन्न पत्र पत्रिकाओं  अख़बारों में।। मंच- 2018 से देश के करीब 18 राज्यों में काव्यपाठ,, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान अख़बार, नई दुनिया, न्यूज 18 जैसे अखबारों की कविसम्मेलन सीरीज़।। टीवी- जी न्यूज़, न्यूज 18 और गुजराती न्यूज़ चेनल से काव्यपाठ।

चिंतन (गीत)

बड़े  हुए  तो  पढ़  लिखकर  हम  ऐसे  दक्ष हुए,, सहज सरल जीवन के हम खुद ही प्रतिपक्ष हुए।   तू  – तू  मैं – मैं  रोज़  हो  रही  मन की संसद में,, मधुर भाव आ गये  हृदय के सब इसकी…

श्रीकृष्ण (छंद)

साँवला सलोना रूप सामने से गुजरा तो नैन से उतर रोम रोम में समा गया…..   भावों  की  तरंगें  झकझोरने  लगीं हृदय शांत ताल बीच जैसे कंकरी गिरा गया…..   रूप  देख  हुई  दंग  मन  में  उठी  उमंग ऐसी प्रीति…

बाहर तो गीत मल्हारें हैं पर भीतर बहुत उदासी है

बाहर  तो  गीत  मल्हारें  हैं  पर  भीतर बहुत  उदासी है। तन को तो सावन भिगो गया पर मन की धरती प्यासी है   हर रोज़ डाकिया आता है लाता है कितनों की पाती, आती  हैं  सबके नाम  मगर  बस मेरे…

आँखें नम कर गया अचानक इक झोंका पुरवाई का

गाती  मुस्काती  बगिया  में  स्वर  गूँजा  शहनाई  का। आँखें नम कर गया अचानक इक झोंका पुरवाई का।   एक घड़ी बिछुड़न की आकर लील गयी खुशियाँ सारी, आज  परायी  कर  दी  बेटी  जो  थी  प्राणों  से  प्यारी। माँ से  बिछुड़…

दर्द सीने में दबाकर मुस्कुराना ही पड़ा

दर्द  सीने  में  दबाकर  मुस्कुराना   ही पड़ा और रस्मन महफ़िलों में गुनगुनाना ही पड़ा।।   थी अना दस्तार की ऊँची बहुत उसके लिए बाप था बेटी का वो सज़दे में आना ही पड़ा।।   लाडली  वो थी चमन गुंजार  था…

मुक्तक / श्वेता सिंह

१.   हमको रहे  उदासी  घेरे, तुम  कैसे  हो? दुख  हर रोज़ लगाते फेरे, तुम कैसे हो? रोज़ हमारे मनस पटल पर नूतन नूतन… याद  तुम्हारा  चित्र  उकेरे, तुम कैसे हो?   २.   पनघट पर पथिकों का देखो आज…

धड़कन धड़कन उसकी ख़ातिर हो बैठी पागल

हृदय  द्वार  की  कोई   ऐसे  खटकाया  सांकल धड़कन धड़कन उसकी ख़ातिर हो बैठी पागल।   सम्मुख  नहीं  मगर  चेहरा  आँखों में डोल रहा सोंधी  मधुर  सुगंध  साँस में  हर पल घोल रहा अंतस के  मरुथल में  उसने उगा दिया  संदल।…

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हिंदी साहित्य की वाचक परंपरा कवि-सम्मलेन, जिसका उद्देश्य समाज का दर्पण होकर उसे उसके गुणों एवं अवगुणों से परिचित करवाते हुए एक उचित दिशा प्रदान करना है। कवि-सम्मलेन की ये परंपरा लम्बे समय से सामजिक चेतना का ये कार्य करती आ रही है। इसी परंपरा को सहेजने और संवारने का कार्य करने के उद्देश्य से हमने यह माध्यम तैयार किया है।

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