रमेश शर्मा
रमेश शर्मा
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रमेश शर्मा जन्म -6/4/1961 शिक्षा -बी ए अभी कोई पुस्तक प्रकाशित नही ! कई कविसम्मेलनों में आमंत्रित रहा हूँ ! कुछ विदेश यात्राएं -कविसम्मेलन के लिए ! पिता का नाम -स्व. श्री मोहन लाल शर्मा माता जी का नाम -शारदा देवी निवासी -चित्तौड़ गढ़ (राज.)

ऐ दूरभाष की सुविधाओं, मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो

ऐ दूरभाष की सुविधाओं , मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो ! फाड़ के फैंकी , उस चिठ्ठी का , पुर्जा पुर्जा ला दो ! मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो !   चिठ्ठी आये ,या ना आये ,भय संशय व्याकुलता –…

क्या तुम में पागल, वो लड़का, पहले सा अनाड़ी, अब भी है ?

क्या तुम में पागल ,वो लड़का ,पहले सा अनाड़ी ,अब भी है ? क्या मेरी पहली ,वो चिठ्ठी ,तुम ने नही फाड़ी ,अब भी है ?   पाती में साथी ,सब लिखना ,हर मौन ,ठहाका और मेला ! वो पगडंडी…

बस नेह रहा, गई  देह प्रिये

निस्तेज हुए अब नैन तेरे ,वेणी में झलकते ,केश धवल ! मुस्कान की झीलें ,सूख गई ,कुम्हलाने लगे ,अधरों के कंवल ! अब देह का है कहाँ नेह प्रिये ! बस नेह रहा ,गई  देह प्रिये !   कोयल की…

जब तुम्हे आशा न होगी, तब मिलूँगा

बारिशें न मन छुएंगी , स्वप्न आना छोड़ देंगे ! पतझरों से दुःख न होगा , नैन दर्पन तोड़ देंगे ! तब मिलूँगा ! जब तुम्हे आशा न होगी ,तब मिलूँगा !   तुम दिखोगी ,मालिनों से ,बढ़ती कीमत पर…

पत्ते झरने लगे, बूढ़ा बरगद हुआ

पत्ते झरने लगे ,बूढ़ा बरगद हुआ – बस गई उम्र का आकलन रह गया ! मेरे गीतों पे जो ,तुम ने बांधी कभी – ज़िल्द वो फट गई ,संकलन रह गया !   एक बरसात की सील ,ऐसी जमी –…

तेज आंधी भी थी, रात भी थी घनी…

तेज आंधी भी थी , रात भी थी घनी , अपनी लौ को लिए , तुम निकलते जरा ! हम पतंगों का जलना , नही शायरी, सच जो छूना ही था, तुम भी जलते जरा !   मेमना खो गया…

हमारे बारे में

हिंदी साहित्य की वाचक परंपरा कवि-सम्मलेन, जिसका उद्देश्य समाज का दर्पण होकर उसे उसके गुणों एवं अवगुणों से परिचित करवाते हुए एक उचित दिशा प्रदान करना है। कवि-सम्मलेन की ये परंपरा लम्बे समय से सामजिक चेतना का ये कार्य करती आ रही है। इसी परंपरा को सहेजने और संवारने का कार्य करने के उद्देश्य से हमने यह माध्यम तैयार किया है।

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