मुमताज़ नसीम
मुमताज़ नसीम
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मुमताज नसीम भारत और विदेशों में कवि सम्मेलनों और मुशायरा का एक सुप्रसिद्ध नाम है वह सब की बहुत प्यारी और लोकप्रिय कवित्री हैं पिछले करीब 10- 12 सालों से गीत ग़ज़ल और नज़रों से 1000 से ज्यादा कवि सम्मेलन और मुशायरा में कविता पाठ कर चुकी हैं मुमताज नसीम भारत की युवा पीढ़ी में खासतौर से बहुत पसंद की जाती हैं उनकी दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं उनके लेख और कविताएं नियमित रूप से विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं मुमताज नसीम दूरदर्शन NDTV आजतक के साथ अन्य कई टीवी चैनल पर काव्या पाठ करती हैं वह दुबई सऊदी अरेबिया मलेशिया नेहरू भी इंग्लैंड और यूएसए मैं भी अपना कविता पाठ कर चुकी हैं उन्हें उर्दू कविताओं के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है   2019 के एक कवि सम्मेलन में हमने उन्हें अमेरिका बुलाया था और उन्हें बहुत पसंद किया गया था 2020 में उन्हें एक बार फिर एक कवि सम्मेलन के लिए बुलाया था पर Corona वायरस के कारण वह कवि सम्मेलन कैंसिल करना पड़ा   मुमताज जी लिखती तो बहुत अच्छा है ही उससे ज्यादा अच्छा पढ़ती  है और उससे कहीं ज्यादा अच्छी इंसान हैं अपनी मधुर आवाज और प्रस्तुत करने के अंदाज से सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लेती हैं यह मैं ही नहीं कह रहा हूं यह सारी दुनिया कहती है और उनको सुनने के बाद आप भी यही कहेंगे तो आइए अब सुनते हैं मुमताज नसीम जी को।

तू जो हो गया है किसी और का मुझे इसका कोई गिला नहीं

तू जो हो गया है किसी और का मुझे इसका कोई गिला नहीं मेरा क्या कुसूर था अब तलक मुझे ये  जवाब मिला नहीं।   तुझे चारागर भी मिल ना सका मुझे चारागर भी मिला नहीं तेरा ज़ख्मे दिल भी…

मेरे आंसुओं को ना पोछो तुम मेरे आंसुओं हिसाब दो

कई साल बाद मिले हो तुम कहाँ खो गए थे जवाब दो मेरे आंसुओं को ना पोछो तुम मेरे आंसुओं हिसाब दो।   किसी रोज तुम मेरी खैरियत कभी फोन करके पूछलो ये तो मैने तुमसे कहा नहीं की मेरे…

तेरे शहर ही की ये शाएरा तेरे इंतज़ार में मर गई

तुझे कैसे इल्म न हो सका बड़ी दूर तक ये ख़बर गई तिरे शहर ही की ये शाएरा तिरे इंतिज़ार में मर गई   कोई बातें थीं कोई था सबब जो मैं वा’दा कर के मुकर गई तिरे प्यार पर…

तेरा नाम आया हँस दिए तेरी याद आई तो रो लिए

दिया साथ हमने खुशी का भी कभी  गम के साथ  हो लिए, तेरा नाम आया हँस दिए तेरी याद आई तो रो लिए।   किसी ऐसे वैसे के सामने कभी दिल का  राज़ न खोलिये, भरे दिल पे बोझ कभी…

तू मेरी नज़र का चिराग़ है तुझे क्यों नज़र से गिराऊँगी

है मेरी वफ़ा की क़सम मुझे तेरा सोग ऐसे मनाऊँगी, तेरी बेवफ़ाई की आग को तेरे आँसुओं से बुझाऊँगी   तेरी आँख से मुझे देखनी हैं ज़माने भर कि नई रुतें , तू मेरी नज़र का चिराग़ है तुझे क्यों…

ये ग़ैर मुमकिन है कि वो पत्थर पिघल जाये

ये मुमकिन है कि रोते रोते मेरा दम निकल जाये, मगर ये ग़ैर मुमकिन है के वो पत्थर पिघल जाये !   अगर चारागरी आती है तुझको तो कुछ एसा कर, के छाला भी ना फूटे ओर काँटा भी निकल…

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