मानसी द्विवेदी
मानसी द्विवेदी
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नाम: डॉ. मानसी द्विवेदी शिक्षा: एम.ए.(हिन्दी, शिक्षाशास्त्र, समाजशास्त्र), पीएच.डी., बी.एड., एम.एड। जन्मतिथि व स्थान: 5 जुलाई 1984, बांसगांव, अयोध्या (उत्तर प्रदेश) पिता: पण्डित खुशीराम दुबे, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, ‘गौतम बुद्ध चरित’ महाकाव्य के रचियता। प्रकाशित कृतियां: कविता संग्रह- ‘एक अंजुरी धूप’, ‘दरकती दीवार’ शैक्षिक पुस्तक: शिक्षा में नवीन प्रवृत्तियां, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन एवं सांख्यिकी। जीवन वृत्त पर प्रकाशित पुस्तक: ‘एक और सीता’- लेखक मृगेन्द्र निवास: डॉ. मानसी द्विवेदी टॉवर नं. 5, फ्लैट नं. 101, ओमेगा ग्रीन, तिवारीगंज, लखनऊ सम्मान: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा डॉ. रांगेय राघव सम्मान। -विधानसभा अध्यक्ष ह्दयनारायण दीक्षित द्वारा अवध रत्न सम्मान। -विधि एवं कानून मंत्री उ.प्र. द्वारा अयोध्या रत्न सम्मान। - महा निदेशक पुलिस, त्रिपुरा द्वारा एवं दुबई शेख ऑडिटोरियम एसोसिएशन द्वारा सम्मानित। - लखनऊ प्रेस क्लब द्वारा सृजन सम्मान। - हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा युवा सम्मान। - प्रयागराज के कुंभ मेले के बहुतायत मंचों का कुशल संचालन। - अयोध्या के एतिहासिक दीपोत्सव का कुशल संचालन। - इसके अलावा करीब 200 सम्मान-पत्र। - 100 से ज्यादा कवि सम्मेलन का कुशल संचालन एवं देश-विदेश में काव्यपाठ। - प्रिंट मीडिया एवं दूरदर्शन के कार्यक्रमों का संयोजन एवं संचालन निरंतर। मो.नं.- 8765101064  Email: [email protected] सम्प्रति: अध्ययन, अध्यापन (उत्तरप्रदेश सरकार) एवं लेखन।

सीता (छंद)

खेत में मिली थी पर मिथिला नरेश जी के राज-रनिवास में सँवारी गयी जानकी, आयी बहू बनके अवध-अवधेश घर पति परिवार में दुलारी गयी जानकी, विधि का विधान परिधान वल्कल,वन.. गंगा पार नाव से उतरी गयी जानकी, रावण का राज…

संघर्ष ने सौ बार सफ़लता दे दी

पूर्ण हो ये कथानक चले आओ न, इस कहानी के नायक चले आओ न, गिन के तारीख़ दिन उंगलियां थक गईं.. तुम किसी दिन अचानक चले आओ न!! मेरे मिज़ाज में मालिक ने चपलता दे दी, यूँ तो सब कुछ…

गुनाह कुछ भी नहीं फिर भी गुनहगार हूं मैं

गुनाह कुछ भी नहीं फिर भी गुनहगार हूं मैं.. क़ुसूर अब भी वही उसकी तलबगार हूं मैं। अपनी बेचैनियों को इक दवा न दे पाई… लोग कहते हैं कि बहुतों की मददगार हूं मैं। मैं अभी चाहू लूं तो ज़िन्दगी…

आखिर बड़ी हुई क्यूँ पापा?

छोटी थी तो ही अच्छा था आखिर बड़ी हुई क्यूँ पापा? वो घर की छोटी अंगनइया बाबा लेते रोज़ बलइंया, भैया के कंधे से लदकर जीने पर चढ़ने की जिदकर अम्मा के सीने से लगकर सोने के सुख से क्या…

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