प्रियांशु गजेन्द्र
प्रियांशु गजेन्द्र
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नाम - गजेन्द्र कुमार सिंह उपनाम - प्रियांशु गजेन्द्र जन्म - 03-03-1979 पिता का नाम - श्री कृष्ण कुमार सिंह पता - ग्राम तोरईगाँव, पोस्ट डिगसरी, जिला बाराबंकी, पिन कोड - 225409 शिक्षा- परास्नातक (हिन्दी), एल0एल0बी0 प्रकाशन- साधना सुमन, साधनाम्बर, साधनाक्षर, साधनांजलि तथा साधना के स्वर(सामूहिक काव्यसंग्रह) राष्ट्रधर्म, गुलाल, इन्दु, अवधज्योति, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, अमरउजाला, आदि पत्र पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाषन। उपलब्धि- दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,बिहार, महाराष्ट्र छत्तीसगढ़ आदि समस्त हिन्दी भाषी प्रदेशों में तथा विभिन्न समाचार चैनलों  डीडी1,आज तक,जी न्यूज़,न्यूज़१८ आदि पर अनेक बार राट्रीय एकता अखण्डता को सर्मिर्पत काव्यपाठ तथा मंच संचालन। सम्मान - ❖ अखिल भारतीय   मंचीय काविपीठ द्वारा महामहिम राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी के कर कमलों से युवा गीतकार ’’देवल आषीष’’ सम्मान।२०१४ ❖ गीत चाँदनी’’ जयपुर द्वारा ’’गीत गन्धर्व’’ सम्मान। ❖ सरला नारायण ट्रस्ट द्वारा डॉ विष्णु सक्सेना सम्मान २०१९ ❖ अनुरंजनी लखीमपुर उत्तरप्रदेश द्वारा ’’जागृति’’ सम्मान। ❖ राष्ट्रीय कविसंगम नईदिल्ली द्वारा ’’दस्तक’’ सम्मान। ❖ अवध भारती समित हैदरगढ बाराबंकी द्वारा ’’अवधश्री’’ सम्मान। ❖ बसन्त साहित्य संस्था बाराबंकी द्वारा ’’बाबा जगजीवन साहब स्मृति सम्मान के अतिरिक्त देश की विभिन्न हिन्दी प्रसारक समितियों द्वारा अनेक सम्मान प्राप्त। योगदान - ➢ प्रकाशनसचिव-साधना साहित्य संस्थान बाराबंकी, उत्तरप्रदेश।

इन अधरों को तुमसे आशा है

इस पनघट से उस पनघट तक घूमा घट से गंगा तट तक मन का मुसाफिर फिर भी प्यासा है, इन अधरों को तुमसे आशा है मयखाने की ओर ना देखूँ नीलगगन का छोर न देखूँ तुम यदि मेरी ओर देख…

नागफनियों की गली में फूल का व्यापार मेरा

गहन गिरवर सघन वन में बहकती पुरवा पवन में दहकते धरती गगन में महकने दो प्यार मेरा नागफनियों की गली में फूल का व्यापार मेरा झोपड़ी या महल मैं कब देखता हूँ हर खुली छत पर कबूतर भेजता हूँ लोग…

यहां न कोई राजा है, यहाँ न कोई रानी है

रहते थे रहते हैं रहेंगे राजा रंक फ़कीर, अनुपम है यह प्रेम नगर जहाँ लाती है तकदीर। ढाई आखर पढ़े कबीरा मीरा यहां दीवानी है, यहां न कोई राजा है, यहाँ न कोई रानी है, यहां घरों में द्वार नही…

हम हैं राही प्यार भरे बाजारों के

मेरे मन का कर लो मोल; कीमत ढाई आखर बोल; कब मोहताज रहे हैं राजदरबारों के, हम हैं राही प्यार भरे बाजारों के, सुनता हूँ वे लोग बड़े हैं,जो गीता और वेद पढ़े हैं, हमने पूरी रामायण में शबरी के…

किसको मन का गीत सुनाऊँ

तुमने खुद को मौन रख लिया मैंने ढाल लिया गीतों में, कहो प्रिये युग युग की संचित मन की पीर कहाँ बरसाउँ, किसको मन का गीत सुनाऊँ आग लगी है चन्दन वन में,भीतर भीतर राख हो रहा, पँछी छोड़ गए…

कहो युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ कैसा लगता है

शरशैय्या पर लगे पूंछने भीष्म पितामह कहो युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ कैसा लगता है। कहो युधिष्ठिर। पतझर सा सूना सूना लगता है उपवन, या फिर गीत सुनाती हैं अलमस्त हवाएं, छमछम नूपुर बजते रहते राजभवन में या फिर करती हैं विलाप व्याकुल…

खो गयी जिनकी निशानी

किस तरह गाऊँ समय की वेदनाएँ, मर चुकी हों जब सभी संवेदनाएं। कब लिखा इतिहास ने उनकी कहानी, खो गयी जिनकी निशानी, खेल लहरों से भँवर में खो गए, देश की नौका चलाकर सो गए, वन जो खाण्डव इन्द्रप्रस्थी बन…

सिया तेरा अभिशापित है राम

युग युग का संकल्प अटल था मुझमे मेरा राम प्रबल था पग-पग पर जग की मर्यादा देकर थोडा ले गयी ज्यादा भोर नयन भर लायी आंसू, पीड़ा लायी शाम, सिया तेरा अभिशापित है राम… अग्नि परीक्षा जग का छल थी…

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