अबुज़र नवेद
अबुज़र नवेद
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मौ. अबुज़र,  सर नाम ( नवेद) "अबुज़र नवेद"   जन्म : 20/4/1994 स्थान : बसी किरतपुर, ज़िला बिजनौर U.P-246731 पिता : कारी मौ.उमर शिक्षा : बी.ए. (उर्दू) हाफिज़-ए-कुरान   काव्य - यात्रा: 2008 में पहला मुशायरा,कवि सम्मेलन पढ़ा अब तक 200 से अधिक मंचों तथा नैशनलचैनल टी.वी. चैनल एवं  आल इंडिया रेडियो पर मुशायरे पढ़े। बहुत ही कम उम्र में अपनी पढ़ाई के साथ-साथ 7 क्लास से अपना क़लाम लिखना शुरू किया। और रफता रफता हिन्दी, ऊर्दू के कई बड़े अखबारों में मेरी गज़लें और आर्टिकल्स मैगज़ीन में प्रकाशित होने लगे।   पहली रिकार्डिंग मेरी डी•डी• ऊर्दू पर 2012 में हुई फिर डी•डी• नैशनल पर हुई फिर ETv Urdu. Zee Salam Alami samay. में हुई, आल इंडिया रेडियो पर लगातार रिकार्डिंग होने लगीं । जो आज तक हो रही है लोगों का प्यार मिल रहा है और अब देश के बड़े न्यूज़ चैनल Zee News पर भी 5 रिकॉर्डिंगहो चुकी हैं। News -18, News 24 पर भी काव्य पाठ किया है।   उपलब्धि : आई.टी.आई कलेज हौज़ खास से पुरुस्कार दिल्ली ज़ाकिर हुसैन कालेज से  1st प्राइज़ कम्पीटिशन में हासिल किया मेरठ चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से एवार्ड । बनारस से इशरत पुरुस्कार और बहुत जगहों से एवार्ड हासिल किए।   अबुज़र नवेद, शायर  दिल्ली

ख़ामोशी की पुकार है  दुनिया

ख़ामोशी  की पुकार है  दुनिया। जीत होकर भी हार है दुनिया।   अपने मतलब से बात करती है किस कदर होशियार है दुनिया।   एक लमहे में डूब जाएगी पानियों पर सवार है दुनिया।   मेरी पगड़ी उछालने के लिए…

सदियों से दुख झेल रहा हूं मैं उस पल के बारे में

जो सुख का संदेस हो मेरे आज और कल के बारे में। सदियों से दुख झेल रहा हूं मैं उस पल के बारे में।   छोड़ गया वो मुझको अकेला इस दुनिया के मेले में ध्यान लगाए बैठा हूं मैं…

मुझसे महबूब मेरा मेहर-ओ-वफा मांगे है

खुशनुमा फूल तर-ओ-ताज़ा हवा मांगे है। मुझसे महबूब मेरा मेहर-ओ-वफा मांगे है।   याद करके तेरी अंगड़ाई का आलम तोबा आईना फिर वही अंदाज़-ओ-अदा मांगे है।   तेरी तस्वीर बनाने के लिए मेरा कलम चांद से नूर सितारों से ज़िया…

तेरे होठों पे जब भी मैं हंसी महसूस करता हूं

तेरे होठों पे जब भी मैं हंसी महसूस करता हूं। तो अपनी जिंदगी में इक खुशी महसूस करता हूं।   तेरी यादों के लश्कर ने मुझे पागल बना डाला मैं अपने शहर को भी अजनबी महसूस करता हूं।   तेरा…

आप ही नज़र आये बार-बार आँखों में

हमने झाँक कर देखा बेशुमार आँखों में । आप ही नज़र आये  बार-बार  आँखों में ।   कितना ग़म उठाती हैं ख्वाब भी तरसते हैं नींद तक  नहीँ आती  बेकरार  आँखों में ।   कोई हम सा दीवाना तुझको मिल…

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हिंदी साहित्य की वाचक परंपरा कवि-सम्मलेन, जिसका उद्देश्य समाज का दर्पण होकर उसे उसके गुणों एवं अवगुणों से परिचित करवाते हुए एक उचित दिशा प्रदान करना है। कवि-सम्मलेन की ये परंपरा लम्बे समय से सामजिक चेतना का ये कार्य करती आ रही है। इसी परंपरा को सहेजने और संवारने का कार्य करने के उद्देश्य से हमने यह माध्यम तैयार किया है।

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